
झूठ एक दुर्भावनापूर्ण, सुनियोजित कृत्य है, जिसमें सत्य को जानते हुए उसे विकृत या असत्य रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह असत्य का सक्रिय, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण प्रसार है।
अप्रमाणित ‘सत्य’ एक सद्भावनापूर्ण विश्वास है—यह दो संभावनाओं के बीच व्यक्तिगत चयन है: अपरिक्षित सत्य या संभावित असत्य। जैसे सिर की मालिश के दौरान आँखें खुली रखें या बंद—यह व्यक्तिगत सुविधा और अनुभव का विषय है।
इस प्रकार ‘आस्था’ एक भाव है—चाहे वह अप्रमाणित सत्य हो या सिद्ध असत्य; यह मूलतः व्यक्तिगत चयन और मानसिक सहजता का विषय है। यदि बात यहीं तक सीमित रहे, तो इसमें कोई समस्या नहीं है। परंतु आस्था को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रचारित करना, या उसे असत्य कहकर निंदा करना—दोनों ही दूसरों को एक ऐसे धुँधले क्षेत्र में ले जाने का प्रयास हैं, जो अप्रमाणित आत्म-धारणा पर आधारित है।
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सादर
सर्वेश कौशल